Himachal Life-style लेख

नशे के दलदल में फंस रही पहाड़ की युवा पीढ़ी

युवाओं को देश की रीढ़ कहा जा सकता है. और भारत जैसी देश में जहाँ आबादी का 50% हिस्सा 25 वर्ष से कम आयु का है, वहां देश के विकास में युवाओं की भागीदारी और बढ़ जाती है. लेकिन आज हमारी ये युवा पीढ़ी नशे के चंगुल में फंसती चली जा रही है। देश का कोई भी कोना इस समस्या से अछूता नहीं है।

पंजाब में स्मैक और चिट्टा जैसे नशे युवाओं की लत बन गए हैं। नशे की ओवरडोज से कई युवाओं की जान तक चली गई।

हमारे हिमाचल का युवा भी नशे कि गिरफ्त में फंसता का रहा है। स्कूल और कॉलेज के छात्र छात्राओं में बीड़ी सिगरेट तो आम बात हो गई है। लेकिन अब भांग, अफीम के साथ साथ युवा स्मैक और चिट्टे का सेवन भी करने लग पड़ा है।

हर रोज़ अखबारों में खबरें आती है कि किसी जगह कोई भांग के साथ पकड़ा गया तो कहीं चिट्टे के साथ। भांग और अफीम तो खैर पहाड़ों की ही उपज है। कुल्लू तथा मण्डी के उपरी इलाकों में थोक में भांग अफीम मिलता है। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से स्मैक, हेरोइन, चिट्टा इत्यादि नशे भी प्रदेश में लाए जा रहे हैं। शिमला में चिट्टे की ओवरडोज से युवकों की जान जाने के कुछेक मामले सामने आए हैं।

अब सवाल यह है कि प्रदेश में नशा इस तरह पनप कैसे रहा है? और इसकी रोकथाम के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?

सबसे पहले चिंतन का विषय यह है कि बचे नशा करने के लिए प्रेरित क्यों हो रहे हैं? इसका सबसे बड़ा कारण है सामाजिक माहौल। जब बचे छोटी उम्र में अपने घर या आस पड़ोस में किसी रिश्तेदार को बीड़ी, सिगरेट या शराब पीते देखते हैं तो उनके में भी जिज्ञासा पैदा होती है कि आखिर इस चीज में ऐसा क्या है? और जब कभी मौका मिलता है तो अपनी उसी जिज्ञासा के कारण बीड़ी सिगरेट या शराब को आजमा लेते हैं और धीरे धीरे ये आदत बन जाती है। एक बार नशे कि आदत लग गई तो फिर इन युवाओं के हाथ बीड़ी सिगरेट से भांग, अफीम की तरफ बढ़ जाते हैं। अब नशे में चिट्टे का सेवन भी फैशन बन रहा है।

दूसरा बड़ा कारण है स्कूल कॉलेजों का महौल और संगत। अक्सर देखा गया है कि स्कूल कॉलेज में ही बहुत से बच्चों को नशे की लत लग रही है। जहां बच्चों को पढ़ने के लिए भेजा जाता है वहां बच्चे नशे की लत लगा के आब रहे हैं। कुछ दोस्त जो पहले से ही नशे के आदी होते हैं, वो अपने दूसरे दोस्तों को भी नशा करने के लिए प्रेरित करते हैं। एक तरफ जहां युवा नशे से अपनी स्वास्थ्य के साथ खेल रहे हैं वहीं नशे पर अपनी ऊर्जा, समय और पैसा भी खराब के रहे हैं जिन्हें अन्यथा किसी सही जगह खर्च किया जा सकता है।

अगर हमें समाज से नशे को खत्म करना है तो पहल हमें ही करनी पड़ेगी और पहले खुद को बदलना पड़ेगा। समाज में एक ऐसा माहौल तैयार करना पड़ेगा जहां हम बच्चों को नशे के लिए प्रेरित ना करके उन्हें नशे से दूर रहने के लिए जागरूक करें। इसके साथ ही समाज को परिपक्व होने की आवश्यकता है। हम कुछ पैसों की खातिर एक पुरी पीढ़ी को अंधकार में धकेल रहे हैं। विडंबना है कि हर कस्बे दुकान पर भांग, अफीम आसानी से मिल जाता है। देसी शराब भी हर गांव में आसानी से मिल जाती है। भांग, अफीम का उत्पादन और बिक्री खुलेआम होती है। इनके अलावा बहुत सी ऐसी दवाइयां हैं जो नशे के तौर पर प्रयोग की जाती है और किसी भी दवाई की दुकान पर आसानी से मिल जाती हैं।

इससे एक तरफ युवा नशे के दलदल में फंसते जा रहा है वहीं दूसरी तरफ सैकड़ों युवा नशे कि बिक्री में पकड़े जाने के कारण जेल की सलाखों के पीछे बंद है। क्या किसी दूसरे रोज़गार से जीवन यापन नहीं किया जा सकता? किसी दूसरे की ज़िन्दगी खराब कर अपनी बेहतर बनाने का कोई औचित्य नहीं है। अगर आप किसी दूसरे के बच्चों को नशा परोस रहे हैं तो कोई आपके बच्चों को भी परोस रहा होगा। इसलिए अगर हम चाहते हैं कि हमारी पीढ़ी नशे से बर्बाद ना हो तो हमें एक समज के तौर पर इन बातों पर मंथन करके नशे की रोकथाम के लिए मिलाकर प्रयास करना चाहिए। तो हमें चाहिए कि हम एक जिम्मेदार नागरिक बनें और कुछ पैसे कमाने की खातिर नशे का व्यापार ना करें। कम उम्र के बच्चों को बीड़ी सिगरेट और तंबाकू उत्पाद न बेचें।

उसके अलावा जो नशा रोकने के लिए सबसे कारगर जरिया है वो है शिक्षा। क्या कारण है कि अधिकतर बच्चे स्कूल कॉलेज में जाकर नशे कि आदत डाल रहे हैं? हम स्कूलों में ऐसा माहौल क्यों नहीं बना पा रहै हैं कि बच्चे स्कूल में किसी तरह भी नशे का उपयोग ना कर पाएं? क्या हम बच्चों को नशे के दुष्प्रभावों से जागरूक करवा पा रहे हैं? अगर नहीं कर रहे हैं तो हमें ऐसा करना चाहिए। एक बच्चों को नशे के दूरगामी दुष्प्रभावों से अवगत करवाएं दूसरा उन्हें नशे से दूर रहकर अपनी ऊर्जा खेल जैसी किसी दूसरी जगह इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करें।

इसके बाद में बात करना चाहूंगा प्रशासन की भूमिका पर। आज जिस कदर नशे ने अपने पांव पसार रखे हैं, उसे समाज और प्रशासन के एकजुट प्रयास के बिना रोका नहीं जा सकता। सवाल यह है कि क्या प्रशासन नशे की रोकथाम के लिए एक ईमानदार प्रयास कर रहा है? हालांकि पुलिस महकमा हर रोज़ नशे के सौदागरों को पकड़ने में सफल तो हो रही है लेकिन फिर भी क्या वजह है कि ये कारोबार और अधिक फैल रहा है? लेकिन मेरे विचार में को लोग पकड़े जा रहे हैं वो इस नेटवर्क के डिलीवरी वाले हैं स्त्रोत कहीं और ही है। पकड़े भी कौन जा रहे हैं? या तो वो खुद नशे में लिप्त हैं या बेरोजगार युवा जो कुछ पैसों के लिए ये काम कर रहे हैं। परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में हमारे युवा जेलों में बंद हैं। लेकिन जब तक इस नेटवर्क की बड़ी मछलियों पर कार्यवाही नहीं होगी तब तक इसे रोक पाना नामुमकिन है।

अब एक सवाल ये उठता है कि जब एक 10-12 पढ़ा, बेरोजगार युवक नशे के बड़े कारोबारियों तक पहुंच जाता है तो क्या हर प्रकार के संसाधन वाला प्रशासन उन व्यापारियों तक नहीं पहुंच सकता। तो एक संदेह भी उत्पन्न होता है कि क्या प्रशासन इस दिशा में ईमानदारी से कदम उठा रही है? कुछ अधिकारी इसके लिए बहुत बढ़िया ढंग से काम भी के रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर कहीं ना कहीं कमी ज़रूर है।
अब बात आती है उत्पादन की, तो भांग अफीम का उत्पादन अधिकतर दूर दराज के हिस्सों में ही होता है। कुल्लू, मण्डी तथा शिमला के ऊपरी क्षेत्रों के साथ साथ प्रदेश ले दूसरे हिस्सों में भी भांग अफीम का उत्पादन हो रहा है। पुलिस प्रशासन इस खेती को नष्ट करने के लिए प्रयास तो करते हैं लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण ये प्रयास नाकाफी है। आजकल टेक्नोलॉजी का ज़माना है। दूर दराज के इलाकों में भांग अफीम की खेती का पता लगाने और इसको नष्ट करने के लिए ड्रोन टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जा सकता है।

तो इस लेख का सार लिखा जाए तो यही कहा जा सकता है कि अगर नशे को सही में रोकना है तो समाज तथा प्रशासन को एकजुट होकर प्रयास करना होगा।

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