मंडी जिला के पधर तहसील में, बरोट जाने वाली सड़क पर स्थित है झटींगरी नामक एक गांव. वर्तमान में हालाँकि इस जगह के बारे में बताने के लिए कुछ खास नहीं है. लेकिन देश की आजादी से पहले इसका एक जानदार इतिहास रहा है जब मंडी रियासत हुआ करती थी. उस ज़माने में झटींगरी मंडी रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी.
यहाँ मंडी के राजा और रानी के महल थे, जहाँ वो गर्मियों में समय बिताने आते थे. देवदार के जंगलों के बीच बने ये महल ज़रूर भव्य रहे होंगे.
बचपन में इन महलों के बारे में सुन रखा था, झटींगरी से गुज़रना भी लगा रहता था लेकिन कभी इन महलों को देखने का अवसर नहीं मिला. एक दिन जब किसी को इनके बारे में पूछा तो पता चला कि महल वहल कुछ नहीं बचे हैं. यहाँ तक कि राजा के महल के तो पत्थर तक नहीं छोड़े हैं.
कुछ समय पहले झटींगरी जाना हुआ तो सोचा कि इस बार देख ही लिए जाएँ ये महल. दोनों महल कुछ दूरी पे बने हुए थे. एक सड़क के दायीं ओर तो दूसरा सड़क के बायीं ओर थोड़ा ऊपर कि तरफ. पहले राजा के महल कि तरफ हो लिए. राजा के महल तो पहुंच गए लेकिन महल तो क्या महल कि दीवारें भी न दिखीं. कुछ नीवें, पत्थर और मलबा है जो महल के होने का सबूत समझा जा सकता है. तस्वीरों में आप देख के अंदाज़ा लगा सकते हैं.
इसके बाद पहुंचे रानी महल. राजा के महल से तो यहाँ हालत कुछ बेहतर हैं. कम से कम महल खड़ा तो है हालाँकि हालत उसके भी कुछ बढ़िया नहीं हैं. कुछ दीवारें और छत का कुछ हिस्सा गिर चुका है. कुछ गिरने की तैयारी में है. दीवारों पर हर कहीं आशिक़ों के लव नोट छापे हुए हैं. बिजली का मीटर तो लगा है लेकिन उसका वेली वारिस कौन है कौन बिल वगेरा भरता है ये जानकारी नहीं मिल पायी. हाँ इतना ज़रूर पता चला की कुछ समय पहले तक यहाँ एक चौकीदार भी हुआ करता था देखभाल के लिए लेकिन आजकल है या नहीं इसकी भी खबर न लग पायी. घोड़े खच्चर वालों ने ज़रूर इस महल का सदुपयोग किया है रात बिताने के लिए.
ऐसा कहा जाता है की स्थानीय लोगों ने राजा के महल के पत्थर तथा लकड़ियां ढो-ढो कर अपने घरों में लगा दिए. और राजघराने के महल को मिटटी में मिला दिया.
देश के आज़ाद होने के बाद जब देश की सभी रियासतें भारत गणतंत्र में मिला दी गयी तो मंडी का राजपरिवार इंग्लैंड में जा के बस गया और राज सम्पति को सँभालने की ज़िम्मेदारी प्रशासन को दे दी गयी. शायद 80-90 के दशक तक इन महलों की भी देखभाल की गयी होगी. लेकिन उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि आज एक महल का तो नामोनिशान भी नहीं बचा है? क्या ये प्रशासन इसका जिम्मेदार है जो इन धरोहरों की देखभाल करने में नाकाम रहा या स्थानीय लोगों की जो इन धरोहरों के महत्व को नहीं समझ सके और अपने निजी स्वार्थ के लिए महल के पत्थर तथा लकड़ियों से अपने घर सजाते रहे.
लेकिन जो भी है बहुत दुखद है. अगर ये महल आज तक सलामत होते या इन्हें हेरिटेज होटल इत्यादि में तब्दील कर दिया होता तो सोचो झटींगरी भी आज जाना मन पर्यटन स्थल होता. ज़्यादा नहीं तो बरोट जाने वाला हर एक पर्यटक यहाँ ज़रूर रुकता. खैर जब है ही नहीं तो आस क्या? अब तो वो आसार भी नहीं दिखतेकी रानी के बचे हुए महल की हालत में कोई सुधर करेगा.