Culture

सुपरमेसी की लड़ाई में दशहरा के दौरान नज़रबंद रहते हैं कुल्लू के दो देवता

सुपरमेसी यानि प्रभुत्व. अक्सर इंसानों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई चलती रहती है. कोई भी क्षेत्र हो इंसान खुद को दूसरों से आगे देखना चाहता है. इस प्रभुत्व की लड़ाई में हमारे देवता भी पीछे नहीं है. देवभूमि हिमाचल में हज़ारों देवी-देवता हैं. इन देवताओं का आपस में एक अनुक्रम स्थापित होता है. और देवताओं का आपस में आचरण भी इसी अनुक्रम के आधार पर चलता है. लेकिन इसी अनुक्रम में कई बार तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. पिछले एक लेख में हमने आपको चौहार घाटी के दो देवताओं के बारे में बताया था जो आपस में रूठे हुए हैं.

ऐसा ही एक मामला कुल्लू घाटी का भी है. कुल्लू के दो बड़े देवता हैं देव श्रिंगा ऋषि और देव श्री बालू नाग. दोनों ही देवता अपने क्षेत्र में काफी प्रभावशाली हैं. लेकिन दोनों में टकराव के कारण ऐसी स्थिति है की दोनों देवता जब कुल्लू दशहरा में आते हैं तो दोनों को नज़रबंद करके रखा जाता है. ऐसा क्या हुआ की बात यहाँ तक पहुँच गयी?

कुल्लू दशहरा में देवी देवताओं का खासा महत्व है. मेले में अढ़ाई-तीन सौ के लगभग देवी देवता आते हैं. दशहरा में भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा के दौरान रथ के दायीं तरफ चलने का अधिकार वरिष्ठ देवता होता है.

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1970 के दशक तक यह अधिकार श्रिंगा ऋषि को प्राप्त था. लेकिन 1970 के दशक में जब देव श्रिंगा ऋषि ने दशहरा में आना बंद कर दिया तो देव बालू नाग में श्रिंगा ऋषि का स्थान ले लिया. लेकिन श्रिंगा ऋषि 11 साल के बाद दोबारा दशहरा में भाग लेने आये तो दोनों देवताओं के कारदार वरिष्ठ स्थान के लिए आपस में लड़ पड़े. उसके बाद कई साल ऐसा ही होता रहा. इन लड़ाइयों में कई लोग घायल भी हुए. उसके बाद प्रशासन ने दोनों देवताओं को रथ यात्रा में जाने पर रोक लगा दी. तब से दोनों देवताओं को कड़ी सुरक्षा के बीच कैंप में ही नज़रबंद करके रखा जाता है.

मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ. मेले में वरिष्ठता की लड़ाई का यह मामला उच्च न्यायालय तक पहुँच गया है. अब दशहरा मेला कमिटी ने दोनों देवताओं को मेले के लिए निमंत्रण देना बंद कर दिया है लेकिन फिर भी दोनों देवता मेले में पहुँच जाते हैं.

देवता बालू नाग के कारदारों का कहना है की बालू नाग राम के छोटे भाई लक्षमण का रूप हैं इसलिए रघुनाथ के भगवान रघुनाथ रथ के साथ चलने का अधिकार उनका है. वहीँ श्रिंगा ऋषि के कारदारों का कहना है कि गुरु का स्थान किसी भी रिश्ते से बड़ा होता है इसलिए रथ के साथ चलने का अधिकार उनका है.

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