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आखिर क्यों रूठे हुए हैं चौहार घाटी के दो देवता

मंडी जिले की चौहार घाटी में बहुत से देवी देवता हैं। उनमें से तीन मुख्य देवता हैं; इलाका हस्तपुर के देव हुरंग नारायण, अमरगढ़ के देव घड़ौनी नारायण और देव पशाकोट।  कहा जाता है कि ये तीनों देवता भाई हैं। देव श्री हुरंग नारायण को बड़ा देव भी कहा जाता है। देव श्री घड़ौनी नारायण हुरंग नारायण के बड़े भाई हैं और देव श्री पशाकोट छोटे भाई।

आपने इंसानों में तो झगडे सुने होंगे, दो भाइयों को लड़ते झगड़ते या रूठते देखा होगा। लेकिन क्या आपने सुना है कि देवता भी झगड़ते और रूठते हैं? जी हाँ देवता भी रूठते हैं. चौहार घाटी के दो देवता जो बरसों से एक दूसरे से रूठे हुए हैं। देव घड़ौनी नारायण और देव पशाकोट इस कदर नाराज़ हैं की दोनों देव न तो आपस में मिलते हैं न ही साथ बैठते हैं। कहते हैं की एक बार दोनों देवताओं को मिलाने की कोशिश की गयी तो दोनों के रथ आपस में चिपक गए। जिन्हे बड़ी मुश्किल से अलग किया गया। आपने देवताओं को एक दूसरे से मिलते देखा होगा। लेकिन ये दोनों देवता कभी भी आपस में नहीं मिलते हैं।

बाएं से दाएं क्रम में देव पशाकोट, देव हुरंग नारायण, देव घड़ौनी नारायण

तो यहाँ दोनों देवताओं के झगडे में देव हुरंग नारायण एक भाई का फ़र्ज़ निभाते हैं और दोनों देवताओं के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं। हालाँकि दोनों के बीच किसी तरह कि सुलह तो अभी तक हो नहीं सकी, लेकिन जब भी तीनों देवताओं ने किसी एक जगह पर इकट्ठा होना होता है तो देव हुरंग नारायण, देव पशाकोट और देव घड़ौनी नारायण के बीच रहते हैं। बैठते भी बीच में हैं और जब तीनो देवताओं ने एक साथ कहीं जाना होता है होता है तब भी बीच में चलते हैं। और यह भी एक नियम सा बन गया है कि देव पशाकोट बड़ा देव के बायीं तरफ बैठेंगे और देव घड़ौनी नारायण दायीं तरफ।

आखिर इस झगडे की वजह क्या है? हालाँकि कहानियां बहुत हैं। उनमें से एक इस तरह से है..
कहा जाता है कि ये तीनो देवता हुरंग में पिण्डियों के रूप में अवतरित हुए थे।  बाद में इन देवताओं के रथ बनाये गए।  जब ये तीनों देवता अवतरित हुए तो पूरी चौहार घाटी को तीन हिस्सों में बांटा गया। जोकि तीनों देवताओं को एक एक हिस्सा मिलना था। ये तीन इलाके थे, हस्तपुर(हुरंग), अमरगढ़(घडौन) और देवगढ़।

बड़ा होने के नाते देव घडौनि नारायण को हुरंग का इलाका मिलना था तो हुरंग नारायण को देवगढ़ और देव पशाकोट को घडौन।  तीनो हारों में मंदिर बनाये जाने थे जहाँ इन पिण्डियों कि स्थापना होनी थी। अब देव हुरंग नारायण और देव पशाकोट कि पिण्डियों को उनके मंदिरों में पहुंचाना था। ये काम कुछ खास लोगों को सौंपा गया जिन्हे महल कहा जाता है।

लेकिन घडौन के महल देव पशाकोट के स्थान पर देव घड़ौनी नारायण कि पिंडी चुरा कर घडौन की तरफ चल पड़ा। उस पिंडी को एक किल्टे में ले जाया जा रहा था। इन पिण्डियों को बिना जमीं पर रखे इनके मंदिरों तक पहुंचाना था, जहाँ इनको स्थापना होनी थी। लेकिन घडौन के महल ने आराम करने के लिए अपने किल्टे को ज़मीन पर रख दिया। किल्टे को जमीन पर रखते ही पिंडी किल्टे से गायब हो गयी। जोकि वापिस हुरंग में प्रकट हुई।

देव घड़ौनी नारायण की पिंडी को एक बार फ़ी घडौन के महल के द्वारा हुरंग से चुरा लिया गया और इस बार वो पिंडी घडौन में पहुंचा दी गयी जहाँ उसकी स्थापना कर दी गयी. घड़ौनी नारायण के घडौन में पहुंचने के बाद हुरंग(हस्तपुर) का में देव हुरंग नारायण की पिंडी को हुरंग के मंदिर में स्थापित किया गया और देव पशाकोट की पिंडी को थल्टूखोड़ के पास देवगढ़ में।

इसी अदला बदली की वजह से देव पशाकोट देव घड़ौनी नारायण से नाराज़ हो गए। जो नाराज़गी अभी तक चली आ रही है।

बाएं कोने में देव पशाकोट, बीच में देव हुरंग नारायण, दाएं कोने में देव घड़ौनी नारायण

यह लेख बज़ुर्गों द्वारा सुनाई गयी दन्तकथा पर आधारित है.

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