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बेहद रोमांचक होगा हिमाचल का ये चुनावी संग्राम, लेकिन कौन मारेगा बाज़ी?

तो विधानसभा चुनावों का मौसम आ गया है। पहाड़ों की सर्दियाँ इस बार गरम रहने वाली हैं। दोनों मुख्य पार्टियों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। कार्यकर्ताओं ने पोस्टर लगाने, नारे लगाने, रैलियों में भीड़ बढ़ने की तो नेताओं ने भाषण देने, विपक्षी नेताओं पर आरोप प्रत्यारोप तथा तंज कसने की। लेकिन किसे चुनेगी हिमाचल की जनता? क्या कांग्रेस वापसी कर पायेगी? या भाजपा दूसरे राज्यों की तरह अपना विजयी अभियान जारी रखेगी? 1985 के चुनाव आखिरी चुनाव थे जिसमे सत्तारूढ़ पार्टी ने दोबारा सरकार बनाई थी। उसके बाद से भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में 5-5 साल का खेल चलता आ रहा है।

इस बार के चुनाव पहले के मुकाबले अधिक रोमांचक होने के आसार हैं। एक तरफ वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह एक बार फिर से आखिरी बार के नाम पर छठी बार मुख्यमंत्री बनके राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम करने का सपना देख रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की तरफ एक और कदम बढ़ाने का। सपना तो सपना है किसी का पूरा होगा किसी का नहीं। किसी की किस्मत का दरवाज़ा खुलेगा किसी का नहीं। इस ताले की चाबी फ़िलहाल जनता की जेब में है।

इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद रोचक होने जा रहा है। क्योंकि दोनों पार्टियों की सिर्फ एक दूसरे से ही नहीं लड़ रही है बल्कि एक अंदरूनी लड़ाई भी है। कहीं मुख्यमंत्री पद की लड़ाई, कहीं विधानसभा टिकट की तो कहीं गुटों की लड़ाई। कांग्रेस में जहाँ स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर और परिवहन मंत्री जी.एस. बाली भी मुंख्यामंत्री बनने की फ़िराक में हैं, वहीँ भाजपा में मुख्यमंत्री के लिए कहीं पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धुमल, कहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा तो कहीं पंकज जम्वाल का नाम के चर्चे हो रहे हैं। कभी यह भी सुनने में आ रहा की भाजपा इस बार बिना मुख्यमंत्री का नाम तय किये प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी।

आखिर एक बात तो तय है कि इनमें से हर नेता चाहता है कि प्रदेश के सबसे ऊँचे पद के लिए उन्हें चुना जाये।

अगर 5 साल पीछे जाया जाये तो यही अंतरकलह तब भी देखने को मिली थी. कांग्रेस में तब भी कौल सिंह चाह रहे थे कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री का उमीदवार बनाये। लेकिन वीरभद्र सिंह को ये मंजूर न था जिस कारण उन्होंने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा देकर हिमाचल में कांग्रेस कि सरकार बनाने के जिम्मा अपने सिर लिया। प्रदेश कि राजनीति में वीरभद्र के प्रभाव के चलते हाई कमान और कौल सिंह दोनों को वीरभद्र सिंह के आगे झुकना पड़ा था और कांग्रेस पार्टी 36-26 के अंतर से सरकार बनाने में कामयाब रही थी।

वहीँ दूसरी ओर गुटबाजी में टिकटों के आबंटन के चलते भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी में दो गुट थे, धुमल गुट और शांता कुमार गुट। पार्टी के द्वारा सीटें बाँट दी गयी दोनों नेताओं में। दोनों ने अपने हिसाब से टिकट बांटें। लेकिन नतीजा रहा कि सबसे बड़े जिले कांगड़ा में पार्टी 15 में से सिर्फ 3 सीटें ही जीत सकीं थीं। कहते भी हैं दो की लड़ाई में तीसरा ही बाज़ी मारता है।

इन चुनावों में कांग्रेस अपनी उपलब्धियां गिना कर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास कारगी। अभी हल ही के दिनों में वीरभद्र सरकार ने हज़ारों नौकरियां निकल कर अपने इरादे दिखा दिए हैं। वहीँ भाजपा अन्य राज्यों की तरह मोदी-शाह के बूते सत्ता हथियाने का प्रयास करेगी।

इसके आलावा नज़र रहेगी नेता पुत्रों पर। हर चुनाव में कोई नेता चुनाव लड़ने से इस्तीफा दे देता है लेकिन अपनी गद्दी अपने पुत्र/पौत्र को सौंप कर। आने वाले चुनावों में भी कुछ नेता पुत्रों के मैदान में उतरने की सम्भावना है। इनमे जो प्रमुख नाम हैं वो हैं मुख्यमंत्री वीरभद्र पुत्र विक्रमादित्य, पूर्व मुख्यमंत्री और नेता विपक्ष प्रेम कुमार धूमल पुत्र तथा सांसद अनुराग ठाकुर भ्राता अरुण धूमल, विधानसभा अध्यक्ष ब्रिज बिहारी लाल पौत्र गोकुल बुटेल।

हिमाचल में तीसरा मोर्चा हर चुनाव में चर्चा का विषय रहता है। पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस की सफलता के बाद तीसरा मोर्चा स्थापित करने के बहुत प्रयास हुए लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली। सपा, बसपा जैसी पार्टियों ने भी कोशिश की लेकिन कोई खास असर छोड़ने में कामयाब नहीं हुए। 2012 में महेश्वर सिंह ने हिलोपा के साथ प्रयास किया लेकिन वो भी केवल खुद की सीट जीत पाने में सफल रहे. इस बार के चुनावों में भी कुछ दल कोशिश में हैं लेकिन उन्हें किसी तरह की सफलता मिल पायेगी, लगता तो नहीं। आम आदमी पार्टी ने 2015 में दिल्ली की सफलता के बाद हिमाचल में भी संगठन बनाने का प्रयास किया था लेकिन पंजाब में हार और संगठन न बन पाने के कारण चुनाव न लड़ने का फैसला कर लिया।

हालाँकि हिमाचल विधानसभा में आजाद उम्मीदवार एक भूमिका निभाने की स्थिति में आ सकते हैं। 2012 के चुनावों में भी 5 निर्दलीय उमीदवार विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे थे। ऐसे में अगर दोनों पार्टियां बहुत पाने में सफल नहीं रहती तो निर्दलीय उम्मीदवार सरकार बनाने में अहम् भूमिका निभा सकते हैं।

हिमाचल का चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा ये तो समय और इ.वी.ऍम. ही बताएंगे। बहरहाल हम चुनाव से सम्बंधित कुछ नयी पुराणी बातें और कुछ ख़बरें आपके समक्ष प्रस्तुत करते रहेंगे। तो साथ रहिएगा।

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