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प्रदेश में बढ़ती आवारा पशुओं की समस्या और समस्या से निपटने के लिए सुझाव

प्रदेश भर में आवारा पशुओं की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा जा रही है. किसी भी शहर या हाईवे में चले जाइये वहां आवारा गाय और बैल इधर-उधर घूमते मिल जायेंगे. जहाँ एक ओर ये पशु सड़कों पर चलने वाले वहां चालकों व पैदल राहगीरों के लिए समस्या पैदा करते हैं वहीं दूसरी ओर किसानों की फसलों के लिए समस्या का कारण बन रहे हैं.

Source: https://himachalwatcher.com

कभी समय पर बारिश न होने के कारण किसाओं की फसल खराब हो जाती है और जो थोड़ी बहुत फसल की होती भी है है वहां आवारा पशुओं द्वारा फसल खराब करने के कारण किसान की परेशानी बढ़ जाती है. हालत यह है कि फसल को बचाने के लिए रात भर पहरेदारी करनी पड़ती है.

दो साल पहले प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद आवारा पशुओं की समस्या का निपटारा करने की बात कही गयी थी. लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी इस समस्या से निपटने के लिए कोई नीति नहीं बन पायी है. हर पंचायत में सरकार द्वारा गौ अभ्यारण्य या गौशालाएं बनाने की बात कही गयी थी लेकिन अभी कितनी गौशालाएं बानी कुछ मालूम नहीं और समस्या जस की तस बानी हुई है. लेकिन गौशालाएं बनाना भी समस्या उत्पन्न होने के बाद निपटारा करने वाली बात है लेकिन क्यों न ऐसे कदम लिए जाएँ जिससे समस्या ही उत्पन्न न हो?

इंसान बहुत मतलबी बन गया है. जब तक किसी चीज़ से उसे फायदा होता है तब तक उसे अपने पास रखता है और मतलब निकल जाने के बाद उसे ठोकरें खाने के लिए छोड़ने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाता. कुछ ऐसा ही इन पशुओं के साथ हो रहा है. जब तक गाय दूध देती है तब तक उसकी सेवा कि जाती है. उसके बाद उसे सड़कों पर छोड़ दिया जाता है. एक तरफ गाय को माता का दर्जा दिया जाता है वहीं दूसरी तरफ उसी माता को सड़कों पर कूड़ा खाने छोड़ दिया जाता है.

वैसे तो आज़ादी किसे पसंद नहीं होती? लेकिन उम्र भर खूंटे से बंधे रहने के कारण ये जानवर भी जंगल की बजाय गाँव कि तरफ भागते हैं या सड़कों से घास अथवा पानी की तलाश में खेतों तक पहुंच जाते हैं. जानवर के लिए घास और फसल एक समान है उसे भी अपना पेट भरना है और वो घास न मिलने के कारण फसल से ही पेट भरता है. इस चक्कर में किसी किसान की मेहनत माटी में मिल जाती है. इसके आलावा इन जानवरों को लोगों का अत्याचार सहना पड़ता है वो अलग. कभी लोगों की मार सहनी पड़ती है. और कई बार गाड़ियों के साथ दुर्घटना में जख्मी हो जाते हैं.

लेकिन इस समस्या से निपटारा कैसे पाया जाये? अभी तक समस्या उत्पन्न होने के बाद उसके निपटारे के सन्दर्भ में विचार किया जा रहा है लेकिन क्यों न समस्या को उत्पन्न ही न होने दिया जाये? इस संदर्भ में एक समाधान यह हो सकता है.

अगर हम अपने फायदे यानिकि दूध या खेती के लिए गाय या बैल को पाल रहे हैं तो हमारा यह नैतिक दायित्व बनता की उस जानवर के बूढ़े हो जाने के बाद भी उस जानवर की सेवा करें नाकि उसे सड़कों पर लोगों के अत्याचार सहने के लिए छोड़ दें. अब लोग इन पशुओं को ज़िम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं. यहाँ लोग अपने बूढ़े माँ बाप को बेसहारा छोड़ देते हैं तो गाय-बैल क्या चीज़ है? लेकिन अगर इंसान ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं तो उन्हें कानून के द्वारा अपना दायित्व निभाने के कोशिश की जाती है. पशुओं की गणना तथा पशुओं की खरीद फरोख्त को पर नज़र रख के इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है.

इसके अंतर्गत सबसे पहले प्रदेश के हरेक घर में पशुओं की संख्या की गणना करके उसे रिकॉर्ड किया जाये. हाल ही में पशुपालन विभाग द्वारा अपनी एप्प पर पशुओं की गणना करवाई गयी है. लेकिन इसका इस्तेमाल कैसे किया जायेगा पता नहीं. इस गणना के तहत किस घर में कितने पशु हैं, उनके विवरण (लिंग, रंग या विशेष पहचान, फोटो इत्यादि) के साथ रिकॉर्ड किया जाये. पंचायतों व पशु औषधालय और चिकित्सालयों के माध्यम से इस कार्य को आसानी से किया जा सकता हैं. इसके उपरांत किसी भी पशु का जन्म, मृत्यु, खरीद या बिक्री को भी पंचायत के माध्यम से ही रिकॉर्ड में अपडेट किया जाये. मुझे इसकी सही जानकारी नहीं हैं लेकिन कुछ वर्ष पूर्व जानवरों की टैगिंग की किसी तरह की स्कीम चली थी. इस तरह की टैगिंग से भी पशुओं की पहचान में मदद मिल सकती हैं. इस रिकॉर्ड को ऑनलाइन डेटाबेस में मेन्टेन करके इस प्रणाली को आसानी से कार्यान्वित किया जा सकता हैं. समय समय पर पंचायत स्तर पर हरेक घर में पशुओं की संख्या का मिलान करके पशुओं की संख्या पर नज़र रखी जा सकती हैं.

इसके आलावा जो गौशालाएं अथवा गौ अभ्यारण्य बनाने की आपके द्वारा कही गयी थी उनका उपयोग भी इस स्कीम के अंतर्गत किया जा सकता हैं. अगर कोई इंसान पशु पालने में असमर्थ हैं तो वह अपने पशु को गौशाला या गौ अभ्यारण्य में छोड़ सकता हैं इसके एवज़ में उससे खर्च के तौर पर कुछ राशि ली जा सकती हैं जिससे से सरकारी खाते में इस योजना की वजह से कोई अधिक बोझ न पड़े.

इस तरह की कोई योजना बन जाती हैं तो आने वाले समय में आवारा पशुओं की वजह से किसानों को भी किसी तरह का नुकसान नहीं झेलना पड़ेगा और गाय, बैल इत्यादि को लोगों का अत्याचार भी नहीं सहना पड़ेगा.

यह सुझाव फरवरी 2018 में मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजा गया था जहाँ से इसे पशुपालन विभाग को भेजा गया था.

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