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एक ऐसा विधायक जिसने अपने संघर्ष की शुरुआत अपने ही पिता के खिलाफ मोर्चा खोलकर की थी

इन चुनावों में दो मुख्य पार्टियों भाजपा, कांग्रेस से अलग विचारधारा रखने वाले में खासकर कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग इस नेता के चुनाव जीतने से बेहद खुश हैं. सफ़ेद दाढ़ी और साधारण सी वेशभूषा वाले इस नेता का नाम है राकेश सिंघा. कामरेड राकेश सिंघा शिमला जिले की ठियोग सीट से चुनाव जीते हैं. सिंघा ने कुल 24791 वोट हासिल किये और 1983 वोट के अंतर से भाजपा के राकेश वर्मा को पटखनी दी.
हिमाचल खासकर शिमला की राजनीति में इस नाम को किसी परिचय की ज़रूरत नहीं है. और जहाँ पुरे प्रदेश मुकाबला दो पार्टियों में चल रहा था वहां CPIM के राकेश सिंघा की जीत अपने आप में बहुत मायने रखती है.

सिंघा दूसरी बार विधायक चुने गए. इससे पहले उन्होंने 1993 में भी चुनाव जीता था लेकिन छात्र जीवन के एक केस में कोर्ट आर्डर के बाद उन्हें विधायकी छोड़नी पड़ी थी. और उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गयी थी. रोक हटने के बाद सिंघा ने 2012 में भी चुनाव लड़ा था और 10 हज़ार से अधिक वोट हासिल किये थे. लेकिन सिंघा के संघर्ष को मुहर इन चुनावों में लगी.

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साधारण से व्यक्तित्व वाले सिंघा शिमला की एप्पल बेल्ट कोटगढ़ के एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखते हैं. पढ़ाई भी सनावर के सेंट लॉरेंस स्कूल से की, जहाँ बड़ी बड़ी हस्तियों के बच्चे पढ़ते हैं. फिर भी सिंघा ने जीवन में संघर्ष का रास्ता चुना. और कई लोगों, संगठनों के अधिकारों की आवाज़ बने.

संघर्ष का नाम है राकेश सिंघा

जिस इंसान ने अपने ही पिता के खिलाफ मोर्चा निकल करके अपने संघर्ष की शुरुआत की उसका भविष्य क्या रहा होगा अंदाज़ा लगाया जा सकता है. कहते हैं कि वो अपने पिता के सेब बागानों में काम करने वाले मज़दूरों की आवाज़ बने. मज़दूरों की दिहाड़ी बढ़ाने के लिए उन्होंने पिता के ही ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. नारे लगवा दिए. हड़ताल करवा दी. आखिरकार अपने पिता से मजदूरों को वाजिब हक दिलाने में कामयाब भी रहे.

Image Source: Himachalwatcher.com

इसके बाद सिंघा ने वो रास्ता पकड़ लिया, संघर्ष का रास्ता. इस रास्ते पे जो भी मिला किसान, मज़दूर या कर्मचारी, जिनकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं था, राकेश सिंघा उनकी आवाज़ उठाने लगे. संघर्ष कि रह कभी आसान नहीं होती. सिंघा का भी ऐसा ही किस्सा है एक जो CPIM कि वेबसाइट पर भी है. सिंघा उन दिनों किन्नौर में वांगतू कड़छम हाइड्रो प्रोजेक्ट में काम कर रहे मज़दूरों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे तो उन्हें गाडी से कुचलने की कोशिश की गयी जिसमे वो थोड़ी बहुत चोट खाकर बचने में सफल रहे.

अभी तक सिंघा सड़कों से ही लोगों की बात व मुद्दे उठा रहे थे. अब देखना यह है कि विधायक बनने के बाद सिंघा कितनी बुलंदी के साथ लोगों की बात विधानसभा में उठाते हैं. यह देखना भी बहुत दिलचस्प होगा कि जहाँ भी भाजपा कांग्रेस कि मिलीभगत दिखेगी जैसे कि विधानसभा सत्र के समय होता है, वहां सिंघा इनके लिए खिंगा साबित होते हैं या नहीं.

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