Draft

क्या देश से आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए?

आरक्षण आज के दौर में कभी न खत्म होने वाली बहस है। जब देश का संविधान लिखा जा रहा था तो समाज के उन तबकों को मुख्यधारा में लाने की परिकल्पना की गयी जो कई कारणों से दूसरे वर्गों की अपेक्षा तिरस्कृत थे। इनमें कुछ ऐसी जातियाँ थीं जिन्हें अछूत समझा जाता था। समाज के तथाकथित उच्च वर्गों द्वारा बात-बात पर उनसे भेदभाव किया जाता था। वहीं कुछ ऐसे लोग थे ऐसी भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन यापन करते थे जहाँ पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं।

इन लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारी नौकरी और बड़े संस्थानों में दाखिले इत्यादि के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी। आरक्षण पाने वालों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग इत्यादि सम्मिलित हैं।पूर्व सैनिक और उनके आश्रितों के लिए भी आरक्षण है वहीँ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान है। वर्तमान में कुल मिलकर लगभग 50% के आसपास सीटें आरक्षित रहती हैं।

आये दिन जगह जगह आरक्षण पाने के लिए आंदोलन होते रहते हैं। गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाटों ने हल ही में आरक्षण के लिए आंदोलन किये। वहीं सामान्य वर्ग आरक्षण के  विरोध में खड़ा नज़र आता है।

तो क्या देश में आरक्षण होना चाहिए?

मेरा जवाब है हां। देश में समानता की जो परिकल्पना बाबा साहब ने संविधान लिखते समय की होगी उस स्थिति में अभी हम नहीं पहुंचे हैं। इसी समानता के लिए आरक्षण ज़रूरी है। आरक्षण उनके लिए होना चाहिए जिन्हें अभी भी घरों में आने नहीं दिया जाता, जिनके हाथ से बना खाना नहीं खाया जाता, जिनको कुछ रास्तों से आने-जाने नहीं दिया जाता जिन्हे अभी भी अछूत समझा जाता है। आरक्षण उनके लिए भी होना चाहिए जिनके बच्चे किसी जनजातीय क्षेत्र के किसी स्कूल में पढ़ते हैं जहां 6 महीने बर्फ रहती है जहां अध्यापक नहीं। और उन्हें जब ऐसे बच्चों के साथ मुकाबला करना है जो दिल्ली चंडीगढ़ में पढ़ कर या कोचिंग लेकर परीक्षा देने आ रहे हैं। जब तक असमानता की ये खाईयां नहीं भरी जाएंगी देश में आरक्षण की ज़रूरत है और तब तक आरक्षण होना भी चाहिए।लेकिन आरक्षण की जो वर्तमान व्यवस्था है उसमें बहुत विसंगतियां पैदा हो गई हैं। अगर इन विसंगतियों को दूर कर लिया गया तभी आरक्षण का सही उपयोग भी होगा और उन खाइयों को भी भरने में आसानी होगी।

तो पहला सवाल यह है कि क्या आरक्षण का लाभ  में उन लोगों तक पहुंच रहा है जिनको वास्तव में इसकी ज़रूरत है? इसको इस तरह समझते हैं: मान लीजिए एक अनुसूचित जाति का परिवार है। उसमें किसी एक व्यक्ति को आरक्षण की वजह से नौकरी मिलती है। इस नौकरी के कारण वह परिवार अपनी स्थिति सुधार लेता है और अपनी अगली पीढ़ियों को बेहतर शिक्षा मुहैया करवाने के काबिल बन जाता है। वहीं उसी समुदाय का एक परिवार ऐसा भी है जो अभी भी दयनीय हालात में ही गुज़र बसर कर रहा है। पहला परिवार अपने बच्चों को किसी शहर में या अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ने है वहीं दूसरा परिवार अभी भी बच्चों को जैसे तैसे गांव के किसी सरकारी स्कूल में पढ़ा रहा है। अब उन दोनों परिवारों के बच्चे किसी प्रतियोगी परीक्षा या नौकरी के लिए एक साथ मुकाबला करेंगे तो बेहतर व्यवस्था मिलने के कारण पहले वाले परिवार का बच्चा ही उसी आरक्षण का लाभ लेकर आगे निकल जाएगा।तात्पर्य यह है कि वर्तमान व्यवस्था में आरक्षण का लाभ कुछ परिवार बार बार ले रहे हैं जबकि कुछ परिवार ऐसे हैं जिन तक आरक्षण की रोशनी अभी नहीं पहुंच पाई है। ऐसी ही परिस्थिति जनजातीय आरक्षण की भी है। शहरों में रहने पढ़ने वाले लोग जो आरक्षण का फायदा उठा कर वहां पहुंचे हैं वही बार बार इसका लाभ ले रहे हैं जबकि जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले कई लोग इससे वंचित हैं।

आरक्षण विरोधियों की एक और बात है  वो है कि आरक्षण कि वजह से गुणवत्ता से समझौता हो रहा है जो काफी हद तक सही है। कई बार नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में देखा जाता है कि सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग के अंकों में बहुत ज़्यादा अंतर होता है। यानि सामान्य वर्ग का एक उम्मीदवार जो एक आधे नंबर से परीक्षा या नौकरी से रह जाता है वहीं आरक्षित वर्ग के वो उम्मीदवार जिन्होंने समान्य वर्ग वाले उम्मीदवार से कहीं कम अंक लिए होते हैं नौकरी या किसी कॉलेज कि सीट हासिल कर लेते हैं। मतलब हम आरक्षण के कारण हम उन लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो दूसरों के मुकाबले काम योग्य हैं जिसका सीधा  असर गुणवत्ता पर पद रहा है।

आज देश के जो राजनीतिक हालात हैं उसमें आरक्षण को खत्म करना मुमकिन नहीं है क्योंकि आरक्षण सीधे तौर पर वोट बैंक से जुड़ा मुद्दा है। तो कोई भी पार्टी खतरा मोल नहीं लेना चाहेगी। ना ही मेरे हिसाब से अभी इस लायक बनें हैं कि आरक्षण को हटाना वाजिब होगा।

लेकिन क्या इसमें सुधार की गुंजाइश है? हां, ज़रूर। मेरे हिसाब से अगर आरक्षण कानून में तीन सुधार कर लिए जाएं तभी आरक्षण का फायदा उन लोगों को मिल पाएगा जिनको सही में इसकी ज़रूरत है। तभी समाज में समानता की कल्पना भी की जा सकती है।

क्या है ये संशोधन
  1.  आरक्षण का लाभ एक बार ही दिया जाए। अगर किसी परिवार के एक सदस्य को एक बार एक श्रेणी के पद के लिए आरक्षण मिल जाए तो उस परिवार को उस श्रेणी और उस से निचे वाली श्रेणी के लिए आरक्षण सूची से हटा दिया जाए। अगर किसी को श्रेणी 3 के पद के लिए आरक्षण मिल जाए तो उस परिवार को श्रेणी 1 और श्रेणी 2 में ही आरक्षण दिया जाए। जिस परिवार को एक बार श्रेणी 1 में आरक्षण मिल जाए उसकी पात्रता किसी भी तरह के आरक्षण के लिए समाप्त कर देनी चाहिए। इसी तरह जनजातीय आरक्षण में भी होना चाहिए। जो परिवार जनजातीय क्षेत्र से बाहर रह रहे हैं या पढ़ाई कर रहे हैं उन्हें आरक्षण ना दिया जाए। ताकि असल में जनजातीय क्षेत्रों की मुश्किलों को झेलने वाले लोगों को इसका लाभ मिल सके।
  2. जो सक्षम है उसको आरक्षण की क्या ज़रूरत? अगर हम चाहते हैं कि आरक्षण का लाभ सही में जरूरतमंदों तक पहुंचे तो इसके लिए जरूरी है कि उन लोगों को आरक्षण से हटा दिया जाए। हर तरह के आरक्षण के लिए परिवार की एक न्यूनतम आय निर्धारित की जाए और इस न्यूनतम सीमा से कम आय वाले परिवारों को ही आरक्षण का लाभ दिया जाए। ताकि आरक्षण का फायदा हर आखिरी जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच सके।
  3.  जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, आरक्षण की वजह से हम कहीं ना कहीं गुणवत्ता से समझौता कर रहे हैं। सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग के कट ऑफ अंकों में कई बार अंतर बहुत हो जाता है। इस अंतर के बीच बहुत से अभ्यर्थी ऐसे सीट या नौकरी वंचित रह जाते हैं जो आरक्षित वर्ग के अंतिम रैंक वाले अभ्यर्थी से ज़्यादा योग्य है। एक उदाहरण के लिए साल 2019 में हिमाचल के सरकारी मेडिकल कॉलेज में सामान्य वर्ग की अंतिम रैंक 7615(550 अंक) थी जबकि आरक्षित वर्ग की अंतिम रैंक 68122(412 अंक) थी। ऐसे में सामान्य वर्ग के कितने विद्यार्थी इन कॉलेजों में सीट पाने से वंचित रह गए। इसका सीधा असर यहां से निकलने वाले डॉक्टरों की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा ही। 

यही कारण है कि मानव संसाधन मंत्रालय ने आईआईटी में पढ़ने वाले कमजोर बच्चों के लिए तीन साल के बीएससी कोर्स शुरू करने का फैसला लिया ताकि उन बच्चों को कॉलेज न छोड़ना पड़े।

इन हालातों से निपटने के लिए यह जरूरी है कि एडमिशन या नौकरी के दौरान आरक्षित वर्गों के लिए एक न्यूनतम कट ऑफ निर्धारित की जाए जिससे नीचे वाले अभ्यर्थियों को सीट या नौकरी ना दी जाए ताकि नौकरी या संस्थानों की गुणवत्ता को भी बरकरार रखा जाये।

आरक्षण का फायदा हर उस व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए जो योग्य है लेकिन संसाधनों से सक्षम नहीं है चाहे वो किसी भी जाती धर्म का क्यों न हो। देश के नागरिकों को भी अपने स्वार्थों को परे रखते हुए यह कोशिश करनी चाहिए कि अगर वो किसी दूसरे व्यक्ति के मुकाबले अधिक सक्षम हैं तो वो आरक्षण न ले जिसका फायदा किसी दूसरे ज़रूरतमंद को हो सके। साथ ही सरकार को भी आरक्षण कानून का उपयोग इस तरह करना चाहिए जिससे की आरक्षण का लाभ हर आखिरी ज़रूरतमंद व्यक्ति तक भी पहुंचे और गुणवत्ता भी बानी रहे जिससे कि समाज में फैली असमानता दूर हो सके।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *