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हिमाचल विधानसभा चुनावों की कुछ खास और मज़ेदार बातें

भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करते हुए वर्षों से चले आ रही रवायत को जारी रखते हुए एक बार फिर सत्तारूढ़ सरकार का तख्तापलट किया है. 1990 के बाद लगातार यह छठा मौका है जब हिमाचल में सता परिवर्तन हुआ है.

जैसा की अनुमान लगाया जा रहा था और एग्जिट पोल में भी दिखाया था कि भाजपा भरी बहुमत के साथ सरकार बनाएगी, वही हुआ और कुल 44 सीटें जीत कर भाजपा ने एक बड़ी जीत दर्ज कि और सत्तारूढ़ कांग्रेस को मात्रा 21 सीटों पर समेट दिया. भाजपा को कुल 48.8% वोट मिले जबकि कांग्रेस को 41.7% वोट मिले. आज़ादों ने 6.3% जबकि सीपीआईएम ने 1.8% वोटों पर कब्ज़ा किया.

कई मायनों में यह चुनाव एक अलग तरह का चुनाव रहा. ऐसा शायद हिमाचल ने पहले कभी न देखा हो. क्या हैं इस चुनाव की महत्वपूर्ण बातें.. और मज़ेदार बातें…लेख थोड़ा लम्बा है पर मज़ेदार है इसलिए पढ़ लीजिये..

पिछले 6 चुनावों की सबसे बड़ी जीत

1993 के बाद ये किसी पार्टी की सबसे बड़ी जीत है. 1993 में कांग्रेस ने कुल 52 सीटें हासिल की थी. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था. वहीँ 2007 में भाजपा 41 सीटें लेने में कामयाब हुयी थी तो 2002 में कांग्रेस ने 43 सीटें झटकी थी. 1998 में मामला 31-31 सीटों पर फंस गया था. तब भाजपा की सरकार बनी थी पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस की 5 सीटों की बदौलत

मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की हार

किसी चुनाव में ऐसा विरले ही देखने मिलता है कि सबसे बड़े पद के नाम पर लड़ रहा उम्मीदवार हार जाये. इस चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल को कभी अपने ही शागिर्द रहे राजिंदर राणा से हार का सामना करना पड़ा.

5 कैबिनेट मंत्रियों की हार

पिछली सरकार में मुख्यमंत्री वीरभद्र समेत कुल 12 कैबिनेट मंत्री थे. जो कि करण सिंह कि मौत के बाद 11 रह गए थे. इन 11 में से अनिल शर्मा ने टीम बदल कर दूसरी पार्टी से बैटिंग की और जीत भी गए. तो इस तरह कांग्रेस के पास रह गए 10 मंत्री. विद्या स्टोक्स का कभी हाँ कभी न वाले मूड के कारण आवेदन रद्द हो गया. अब बचे हुए 9 में से वीरभद्र सिंह समेत कुल 4 मंत्री ही चुनाव जीतने में सफल हो सके. बाकि 5 को हार का मुंह देखना पड़ा. हारने वाले मंत्रियों में स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर, परिवहन मंत्री जी.एस. बाली, आबकारी व कराधान से प्रकाश चौधरी, शहरी विकास वाले सुधीर शर्मा और वन विभाग के भरमौर से ठाकुर सिंह भरमौरी शामिल हैं. मंत्रियों के अलावा विधानसभा स्पीकर गंगू राम मुसाफिर का भी यही हाल हुआ.

भाजपा के पूर्व मंत्रियों का भी यही हाल

मंत्रियों की हार का सिलसिला सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं था. भाजपा के कई पूर्व मंत्रियों को भी मुंह की खानी पड़ी. यहाँ पूर्व मुख्यमंत्री धूमल के अलावा दो पूर्व मंत्री ठाकुर गुलाब सिंह और रविंदर सिंह रवि अपनी सीट निकलने में असफल रहे. संयोग देखिये की इन दोनों ही पूर्व मंत्रियों को आजाद उम्मीदवारों ने पटखनी दे डाली. गुलाब सिंह तो 8600 से ज़्यादा मतों से हारे हैं. मंत्री तो मंत्री भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती भी अपनी सीट नहीं बचा पाए. तो इस चुनाव में दो तिहाई के करीब बहुमत लेने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और पार्टी अध्यक्ष दोनों को हार नसीब हुई.. है न मज़ेदार चुनाव?

जीत का श्रेय

मुख्यमंत्री का चेहरा तो अपनी सीट नहीं जीत सका तो फिर इत्ती बड़ी जीत का श्रेय किसको देना चाहिए? क्या 2014 लोकसभा चुनावों की तरह फिर मोदी मैजिक चला? अब मैजिक तो पता नहीं हाँ मेहनत बहुत किये हैं मोदी जी. पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने हिमाचल में 7-8 रैलियां की प्रचार के लिए. दूसरे मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री जो आये वो अलग.

जीत का अंतर

इस चुनाव में जीत का सर्वाधिक अंतर 15896 रहा जो भाजपा के विनोद कुमार ने मंडी के नाचन में हासिल किया और सबसे कम किन्नौर में कांग्रेस के जगत सिंह नेगी का यह 120 मतों का.

मंडी में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़

हालाँकि स्थिति तो कांग्रेस की कुछेक जिलों को छोड़ कर सबमे ही खराब रही लेकिन मंडी कांग्रेस से कुछ ज़्यादा ही रुष्ट दिखी. मंडी ने आज़ाद को 1 सीट देना उचित समझा लेकिन कांग्रेस को नहीं. तो कांग्रेस को मंडी में मिला निल बट्टे 10 और भाजपा को देहले में से नेहला.

अगर अभी तक नहीं पता तो यह भी पढ़िए कौन किस सीट से और कितने वोटों से जीता?

कांगड़ा में कांग्रेस की 10-3 की बढ़त इस बार भाजपा की 11-3 की बढ़त में बदल गयी. चम्बा, कुल्लू और बिलासपुर में कांग्रेस ने 1-1 सीट लेकर क्लीन स्वीप बचा लिया.

भाजपा के गढ़ में कांग्रेस की सेंध

ऐसा नहीं है की कांग्रेस ने इस चुनाव में सब खोया ही है पाया कुछ नहीं. पाया भी बहुत है. जीतने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और पार्टी अध्यक्ष को हराना भी कोई कम उपलब्धि नहीं है लेकिन इसके अलावा भी कांग्रेस के लिए जो संतोष की बात है वो है भाजपा के गढ़ में भाजपा से ज़्यादा सीटें जीतना. धूमल का क्षेत्र भाजपा का गढ़ मन जाता है. 2012 के चुनावों में यहाँ पहले तो 2 सीटें मिली थी लेकिन उपचुनाव में एक गंवानी भी पड़ी थी और इस बार ले आये हैं पांच में से तीन. बहुत खूब!!

अपनों ने ही दिया दगा

कांग्रेस के अपने हुए परायों ने भी भाजपा की जीत में अपना चंदा दाल दिया. ऐसी दो मुख्य सीटें रहीं द्रंग और शिमला शहरी. द्रंग में कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष ने बगावत की, वोट लिए 7672 और कांग्रेस की हार का अंतर रहा 6541. हाँ शायद जीत भी सकते थे. वहीँ शिमला शहरी में हरीश जनारथा टिकट न मिलने पर अकेले ही लड़ भिड़े. हट्टे कट्टे हैं शरीर से भी और राजनीती से भी. तो परिणाम ये रहा की जीतने वाले सुरेश भरद्वाज को मिले 14012 और जनारथा साहब ले लिए 12109. कांग्रेस के टिकटधरी भज्जी 2680 के साथ चौथे स्थान पर. कुल मिला के होते हैं 14789. भाई ये क्या कर दिया? ये तो जीत ही जाते नहीं तो.

कॉमरेड सिंघा

सड़कों तो बहुत लड़े हैं, कुटे भी गए हैं अब विधानसभा में एक बार फिर लड़ेंगे ठिओग के नए विधायक कॉमरेड राकेश सिंघा. 1993 में भी जीते थे अब 24 साल के बाद फिर जीत लिए. अब देखना ये है की ये सिंघा दोनों पार्टियों को कैसे देते हैं खिंगा(डंडा).

चुनावी राजनीती में कैसे निभे रिश्ते

हिमाचल छोटू सा प्रदेश है, जनमानुष भी कम हैं तो कम लोगों में अक्सर रिश्तेदारियां बन जाती हैं. और राजाओं और राजनेताओं की तो आपस में ही बनती है. इस चुनाव में भी रिश्तेदार खूब लड़े कुछ एक तरफ से तो कुछ आमने सामने से.तो कैसे निभे वोट की इस राजनीती में रिश्ते.

बाप-बेटे जीत गए भाई: 

राजसी खानदान के  सबसे अधिक उम्र की उम्मीदवार वीरभद्र सिंह और उनके बेटे जोकि सबसे जवान उम्मीदवार भी हैं(वैसा ऐसा पहली बार हुआ है 60-70 सालों में ), दोनों अपने अपने क्षेत्र से चुनाव जीत गए. आखिर पिता ने पुत्र के लिए अपनी सीट का बलिदान दिया था.

कुड़म-कुड़म दोनों हारे:

ये रिश्ता बना है हमीरपुर के सांसद, क्रिकेटर, लेफ्टिनेंट अनुराग ठाकुर के कारण. धूमल के पुत्र अनुराग बियाह लाये थे जोगिन्दर नगर के गुलाब सिंह ठाकुर की कन्या को. तो सबसे बड़ा झटका इन चुनावों का इन्ही लेफ्टिनेंट साहब को लगा है. पिता भी हारे तो ससुर भी, माने कुड़म-कुड़म दोनों ढेर.(वैसे दोनों में जोश बहुत है रात के 11 बजे तक लड़ते रहे दोनों ईवीएम मशीनों से रिकाउंटिंग करा करा के, पर ईवीएम का लिखा कौन मिटा सके है-ऐसा चुनाव आयोग का कहना है). संयोग देखिये दोनों कुड़मों को हर मिली राणाओं के हाथों.

पिता-पुत्री भी गए काम से:

पिता-पुत्र और कुड़मों के बाद अब रिश्ता निभाने की बरी थी पिता पुत्री की. बगल वाली सीट मंडी में पुत्री चंपा को हारते देखा तो द्रंग से खुद भी हार लिए पुत्री मोह में.

एक कुड़म जीता एक हारा:
राजाओं के खानदान के वीरभद्र सिंह और महेश्वर भी दूर-पार के रिश्ते में कुड़म होते हैं. कुड़मो की ये जोड़ी विपक्षी सेनाओं से लड़ रहे थे तो परिणाम भी उलट ही रहा एक जीता तो एक हारा.

ससुर-दामाद:
ससुर-दामाद का रिश्ता भी बड़ा विचित्र होता है. इन चुनावों में एक ससुर-दामाद की जोड़ी भी थी. पहले वाले रिश्तेदार या तो एक ही टीम से खेल रहे थे या अलग-अलग फील्ड में लेकिन ससुर-दामाद की ये जोड़ी आपस में ही भीड़ गयी. सोलन के धनि राम शांडिल से दंगल करने भाजपा ने उन्ही के दामाद राजेश कश्यप को भेज दिया. उस नारी की क्या व्यथा रही होगी पति या पिता? लेकिन कर्नल साहब ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली है. चाहे हलके से ही सही लेकिन लपेट लिया ससुर ने दामाद को.

एक सेना बदलू सेनापति

वीरभद्र की सेना के इस सेनापति ने आने वाली हार शायद पहले ही भांप ली थी या सेना के भीतर भी कुछ मन सम्मान की बात हुई होगी. तो पंडित सुखराम के सुपुत्र अनिल शर्मा पिता, पुत्र परिवार सहित इस जीतने वाली सेना में आके लड़े और अपने साथी सेनापति की पुत्री को हराकर अब फिर से सेनापति बनने के हक़दार हो गए हैं. आखिर इस सेना को भी अनुभवी सेनापतियों की ज़रूरत है.

अंत में, यक्ष प्रश्न, कौन बनेगा मुख्यमंत्री?

चुनाव से पहले भी भाजपा में एक अनार सौ बीमार वाले हालत थे. कभी, धूमल, कभी नड्डा तो कभी जम्वाल. चाहते तो सभी होंगे. लेकिन इसी चाह के चाकर में अक्सर फुट पद जाया करती है. तो आला कमान ने पहले कहा की ये युद्ध बिना सेनाध्यक्ष ले लड़ा जायेगा, फिर न जाने क्या हुआ प्रदेश के सबसे ऊँचे ओहदे के उम्मीदवार बन गए प्रेम कुमार धूमल. लेकिन शायद ये नियति को मंज़ूर ही नहीं है तभी तो सेना को जीता दिया सेनाध्यक्ष को लिटा दिया. अब हो तो सकता है की लिटे हुए सेनाध्यक्ष को अमृत पिलाकर राजगद्दी सौंप दी जाये लेकिन आसार नगण्य है, सेनाध्यक्ष खुद भी कबूल कर बैठे हैं. तो अब नड्डा भी दिल्ली छोड़ के शिमला की वादियों में आ सकते है वैसे भी दिल्ली में प्रदुषण खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है, लेकिन अभी ऐसा भी प्रतीत नई होता. इनके अलावा एक भाजपा के संगठन में काम कर रहे अजय जम्वाल का भी नाम आ रहा है?

लेकिन क्यों न जो मैदान-ऐ-जंग में लड़े थे उन्ही में से किसी एक को चुना जाये. क्यों नहीं? अगर ऐसा होता है तो मंडी की सराज घाटी के जय राम ठाकुर के सर बांध सकता है मुख्यमंत्री पद का ताज. अगर ऐसा होता है तो इतिहास में पहली बार मुख्यमंत्री किसी मंडयाल को मुख्यमंत्री पद मिल सकता है. अब तो सोशल मीडिया में भी आवाज़ उठ रही है अबकी बार जय राम . चलो देखते हैं.

हाँ मुझे भी आभास हुआ कि लेख लम्बा हो गया है, ये चुनाव भी लम्बे ही थे इंतज़ार भी लम्बा था. मुझे तो बहुत मज़ा आया लिखते हुए, आपको आया या नहीं आप जाने. इस पूरा कितने लोग पढ़ेंगे मुझे तो ये भी नई पता. लेकिन अगर आपने ये लेख पढ़ा आधा अधूरा ही सही, मज़ा आया हो थोड़ा ही सही तो एक आध कमेंट ता करि सकायें तुस्से.. ता करि दिया दो ता मिन्ट लगदे..

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8 thoughts on “हिमाचल विधानसभा चुनावों की कुछ खास और मज़ेदार बातें”

  1. Superb post Dogra Ji.. Aapne to Chunavi guthi hi suljha di.. Laajwab and mzedar.. In short Superrrrrr se bhi uparrrrrrr post👌👌👌👌

    1. @Goldi ज़िक्र तो और बहुत हैं करने को पर आर्टिकल लम्बा हो गया था तो रह गया बहुत कुछ..

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