Himachalis

एक फौजी जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा

9 सितम्बर के दिन 1974 में जन्म हुआ था भारत के सबसे जांबाज फौजी का। वो फौजी जिसने महज 24 साल की उम्र में पाकिस्तानी सेना की धज्जियां उड़ाते हुए वीरगति प्राप्त की। नाम है विक्रम बत्रा, जिन्हे जाना जाता था शेरशाह नाम से भी और ये दिल मांगे मोर विजयी नारा था उनका। कॅप्टन बत्रा, कारगिल शुरू होते समय लेफ्टिनेंट थे, और पॉइंट 5140 जीतने के बाद लड़ाई के दौरान ही कॅप्टन बनाये गए, और ज़िंदा लौट आते तो एक दिन ‘चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ’ ज़रूर बनते।

वक्त था भारत V/S पाकिस्तान, कारगिल की लड़ाई का। यूँ तो हिमाचल हमेशा से वीरभूमि रही है। भारत का पहला परम वीर चक्र भी एक हिमाचली को ही मिला था और कारगिल में भी 527 में से 52 शहीद हिमाचल से ही थे। लेकिन कॅप्टन बत्रा वो शहीद हैं जिन्हे कभी भुलाया नहीं जायेगा और उनकी जांबाजी के किस्से आने वाले सैंकड़ों सालों तक सुनाये जांयेंगे। आम जनता को न भी सही लेकिन नए फौजियों को ज़रूर सुनाये जायेंगे।

आज शेरशाह के जन्मदिवस पर इस वीर को नमन करते हुए हम आपको थोड़ा सा रूबरू करवाते हैं।
9 सितम्बर, 1974 को पालमपुर के बत्रा परिवार में जुड़वाँ बच्चों ने जन्म लिया। विक्रम और विशाल जिन्हे प्यार से लव और कुश कहा जाता था। लव-कुश नाम भगवान राम के बच्चों के ऊपर रखा गया। पिता श्री गिरधारी लाल बत्रा और माँ श्रीमती कमल कांता बत्रा दोनों ही शिक्षक थे। विक्रम बत्रा का बचपन जुड़वा भाई और दो बहनों के साथ पालमपुर में ही गुज़रा और प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं हुई। माध्यमिक तक डी.ए.वी. में पढ़े और उसके बाद बाहरवीं तक केंद्रीय विद्यालय में। स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ खेलों में भी काफी रूचि थी विक्रम की। कराटे और टेबल टेनिस में स्कूल का प्रतिनिधित्व भी किया।

स्कूल पूरा करने के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ चले गए। जहाँ डी.ए.वी. कॉलेज से मेडिकल में B.Sc. किया। कॉलेज में NCC में भी भर्ती हो गए। पहले एयर विंग और फिर आर्मी विंग। NCC का ‘C certificate’ हासिल किया और 1994 की गणतंत्र दिवस परेड में भी हिस्सा लिया।

चाहत फ़ौज में जाने की ही थी लेकिन कॉलेज में ही हॉन्ग कॉन्ग की शिपिंग कंपनी ने मर्चेंट नेवी का ऑफर दे दिया। ऑफर अच्छा था तो जाने की तयारी भी कर ली और वर्दी भी सिला दी गयी। लेकिन विक्रम की तकदीर में नियति ने कुछ और ही लिखा था। तो मर्चेंट नेवी का विचार त्याग के MA में एडमिशन ले के CDS की तैयारी में जुट गए। साथ ही एक पार्ट टाइम नौकरी भी कर ली ताकि परिवार पे बोझ न बने रहे।
1996 में विक्रम बत्रा ने SSB पास किया और पहुंच गए भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून। 19 महीने की ट्रेनिंग पूरी करके 6 दिसम्बर 1997 को भारतीय सेना में शामिल हुए। लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा 13 JAK Rifles का हिस्सा बने और 1 महीने की रेजिमेंट ट्रेनिंग के बाद जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर में तैनात हुए। सोपोर में कई बार आंतकियों से सामना हुआ। एक बार गोली शरीर को छूटे हुए दूसरे जवान को लग गयी, जिससे वह मारा गया। इस बात से दुखी बत्रा ने बड़ी बहन को फ़ोन पर बताया ‘दीदी वो गोली मेरे लिए थी, लेकिन मैंने एक जवान खो दिया’।

कुछ ही समय बीता था विक्रम बत्रा को आर्मी ज्वाइन किये हुए। छुट्टी मनाने घर आये थे। उसके बाद उनकी यूनिट को उत्तर प्रदेश जाना था। लेकिन तभी कारगिल युद्ध शुरू हो गया तो यूनिट को द्रास सेक्टर बुला लिया गया। अपनी बटालियन के साथ लेफ्टिनेंट बत्रा 6 जून को द्रास पहुंचे। 13 जून को 2 Raj Rif ने तोलोलिंग पर कब्ज़ा किया। तोलोलिंग पर 2 Raj Rif की जगह 13 JAK Rif ने ली।

13 JAK Rif का पहला मिशन था पॉइंट 5140, जोकि रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण पोस्ट थी। कांगड़ा के ही कॅप्टन संजीव जम्वाल और लेफिनेंट विक्रम बत्रा की अगुवाई में दो टुकड़ियां पॉइंट 5140 फतह करने निकल पड़ी। खड़ी चढ़ाई और दुश्मन ऊंचाई पे होने के कारण दिन में हमला करना मुश्किल था। इसलिए रात को हमला करने की योजना बनाई गयी। लेफ्टिनेंट बत्रा ने अपनी टुकड़ी के साथ पीछे की तरफ से हमला किया। कई पाकिस्तानी सैनिकों को मारते हुए और बनकर तबाह करते हुए बत्रा की टुकड़ी ने पॉइंट 5140 जीत लिया और बेस कैंप को अपना विजय सिग्नल भेजा ‘यह दिल मांगे मोर’।

पॉइंट 5140 कि जीत की बाद साथी जवानो की साथ कॅप्टन बत्रा

पॉइंट 5140 की जीत के बाद लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को कॅप्टन बना दिया गया। अब कॅप्टन बत्रा अख़बार की सुर्ख़ियों का हिस्सा बन गए।
कॅप्टन बत्रा को अगला मिशन दिया गया पॉइंट 4875 पे कब्ज़ा करना।  अस्वस्थ होने की बावजूद 6 जुलाई की रात,  भारी ठण्ड, कोहरे के बीच रात के अँधेरे में शेरशाह ने अपनी टुकड़ी के साथ 4875 के लिए चढ़ाई कर दी। अब शेरशाह के नाम का खौफ भी पाकिस्तानी सेना पे चढ़ गया था। हालाँकि पाकिस्तानी फ़ौज को शेरशाह के आने की भनक हो चुकी थी। लेकिन फिर भी शेरशाह ने अपने जवानों के साथ निडरता के साथ लड़ते हुए बंकरो से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया था। 4875 मिशन लगभग पूरा हो गया था। जब सूबेदार रघुनाथ एक घायल हुए अफसर को बचाने के लिए जाने लगा तो कॅप्टन बत्रा ने रघुनाथ रोकते हुए कहा कि तुम्हारे बाल बच्चे हैं घर में और मेरी शादी भी नहीं हुई है और खुद भारी गोलीबारी के बीच उस अफसर को बचाने के लिए निकले लेकिन स्नाइपर की एक गोली कॅप्टन बत्रा के सीने में लग गयी। और तभी RPG का टुकड़ा उनके सिर में लगा। कॅप्टन बत्रा वहीँ वीरगति को प्राप्त हुए। उस सुबह भारत ने 4875 जीत लिया लेकिन कॅप्टन विक्रम बत्रा को खो दिया।

कॅप्टन बत्रा के भाई विशाल बत्रा जब सूबेदार रघुनाथ से मिले तो रघुनाथ ने रोते हुए ये किस्सा बताया। कॅप्टन बत्रा को इस बहादुरी के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

5140 जीतने कि बाद कॅप्टन बत्रा का इंटरव्यू

 

कॅप्टन विक्रम बत्रा के बारे में कुछ खास बातें

  • कॅप्टन विक्रम बत्रा के बारे में कुछ खास बातें
    • हर हीरो की तरह इस हीरो की भी एक प्रेम कहानी है। डिंपल चीमा, वो लड़की जिसे विक्रम बत्रा यूनिवर्सिटी में मिले, साथ पढ़े और एक दूसरे को पसंद करने लगे। दोनों शादी करना चाहते थे। कॅप्टन बत्रा ने लड़ाई ख़त्म होने पर शादी का वादा भी किया था। लेकिन होनी को ये मंज़ूर नहीं था। बहुत से सपनों के साथ साथ ये सपना भी अधूरा रह गया। कॅप्टन बत्रा की शहादत के बाद डिंपल ने उम्र भर शादी न करने का फैसला किया। डिंपल आजकल एक स्कूल में पढ़ाती हैं। विक्रम के माता-पिता द्वारा समझाने के बाद भी डिंपल ने शादी नहीं की।
    • पॉइंट 5140 फतह करने के बाद आर्मी चीफ ने खुद विक्रम बत्रा को फ़ोन पर बधाई दी।
    • कॅप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
    • कॅप्टन बत्रा के भाई विशाल बत्रा ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था ’10 साल हो गए, बहुत कुछ बदल गया, बहुत कुछ वैसा ही है। मेरे बाल सफ़ेद होने को आये विक्रम हमेशा से जवान है। समय उसे छू नहीं सकता।
      विशाल बत्रा की पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
    • कॅप्टन बत्रा के सम्मान में 4875 को बत्रा टॉप कहा जाता है और द्रास ट्रांजिट कैंप को भी कॅप्टन बत्रा ट्रांजिट कैंप का नाम दिया गया।
    • आर्मी चीफ जन. वी.पी. मलिक ने कॅप्टन बत्रा के पिता से कहा था कि अगर विक्रम कारगिल से ज़िंदा वापिस आया होता तो 15 साल में मेरी कुर्सी पर होता।
    • कॅप्टन विक्रम बत्रा के सम्मान में SSC अल्लाहाबाद में एक हॉल का नाम ‘विक्रम बत्रा हाल’, जबलपुर कैंट में एक आवासीय काम्प्लेक्स का नाम ‘कॅप्टन विक्रम बत्रा एन्क्लेव’ और IMA देहरादून में कैडेट मेस का नाम ‘विक्रम बत्रा मेस’ रखे गए हैं।
    • इंडियन आयल ने कॅप्टन बत्रा के सम्मान में अपने एक प्रिंट कैंपेन में विक्रम बत्रा के देश के लिए आकर्षक नौकरी छोड़ने के फैसले की सराहना करते हुए लिखा
      ‘Sometimes an ordinary Indian can make a Rs 120,000 crore company feel humble.For every step we take, there’s an inspired Indian leading the way,’ read the ad copy, alongside a black-and-white etching of Captain Batra.
    • अर्चना मसीह ने rediff.com पर कप्तान विक्रम बत्रा कि ऊपर एक लेख प्रकाशित किया The soldier who became a legend
    • पाकिस्तान कि एक डिफेन्स पोर्टल defence.pk ने भी rediff.com कि इस लेख को अपने वेब पोर्टल प्रकाशित किया था।
    • विक्रम बत्रा ने अपने पिता से कहा था की या तो तिरंगा लहरा के आऊंगा या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा।
    • IMA में विक्रम बत्रा कि नोट पैड के फुट नोट में लिखा था ‘If Death comes to me before I prove my blood, I promise I’ll kill Death.’

And He kept his words. Happy Birthday Captain…

 

 

 

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