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साल में आठ महीने जलमग्न रहते हैं कांगड़ा के ये मंदिर- बाथू की लड़ी

Source: Incredible Himachal

इतिहास ने हमें बहुत नायब तोहफे दिए है। इनमें से एक है बाथू की लड़ी मंदिर। बाथू की लड़ी मंदिर हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले के ज्वाली तहसील में स्थितं है।

ये मंदिर 6 मंदिरो की श्रृंखला है। इसमें 5 छोटे मंदिर हैं और एक मुख्य मंदिर है। ये बेहद खूबसूरत ऊंचे और पुराने है। माना जाता है की ये मंदिर 5000 साल पुराने है। 1970 के दशक में पौंग बांध बनने के कारण यह सारा इलाका महाराणा प्रताप सागर में डूब गया। ये मंदिर भी साल के आठ महीने महाराणा प्रताप सागर में जलमग्न रहते है।

इन मंदिरों क आलावा बाथू कि लड़ी में 75 फुट ऊँचा एक विषाल स्तम्भ भी हैं. जब सभी मंदिर जलमगन हो जाते हैं तो इस स्तम्भ का कुछ हिस्सा पानी के बहार दीखता हैं. हालाँकि पानी में डूबे रहने के कारण ये मंदिर धीरे धीरे टूटते जा रहे हैं लेकिन फिर भी इनकी सुंदरता में अभी कोई कमी देखने को नहीं मिली है। इन मंदिरों में उपयोग हुए पथरों पर सुन्दर नकाशी की गयी है जो की हमारे प्राचीन कला की सुंदरता का परिचारक है।

ये मंदिर बाथू नामक पत्थर से बनाये गए हैं। इसलिए इसका नाम बाथू की लड़ी रखा गया था। मंदिर की उत्कृष्टि के बारे में स्थानीय लोगो का कहना है की ये मंदिर राजा गोवर्धन सिंह ने 7141-1773 के बीच बनाया था। और अन्य कुछ लोगो का मानना है की यह मंदिर महाभारत काल में पांडवों द्वारा बनाये गए थे।

बाथू की लड़ी की एक दंतकथा

एक दंतकथा के अनुसार ये मंदिर पांडवो ने अपने अज्ञात वर्ष के समय बनाये थे। पांडवो ने भगवान् श्री कृष्ण से आग्रह किया था की उन्हें स्वर्ग तक जाने की सीढी बनानी है। तो भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था की अब से 6 महीने तक सूरज नहीं उगेगा। तब तक तुम सीढी बना सकते हो। लेकिन साथ में एक शर्त भी रखी गयी कि जिस दिन सूरज उगेगा उस दिन तुम्हे सारा काम छोड़कर आगे बढ़ना होगा। तभी से पांडव अपने अपने काम पे लग गए। लेकिन एक दिन एक महिला ने रोशनी के लिए दीपक जलाया तो पांडवो को लगा कि सूरज उग आया है। वे वहीं पर काम छोड़कर आगे बढ़ गए। माना जाता है कि सीढी स्वर्ग से कुछ ही दूरी पर थी।

इस मंदिर में भगवान् श्री कृष्ण और शेषनाग की मूर्तियां स्थापित कि गयीं थीं। लेकिन पौंग बांध बनने के बाद उन मूर्तियों को इंदोरा के पास एक मंदिर में ले जाया गया। कहा जाता है कि यहाँ सूर्य तब तक नहीं ढलता है जब तक कि सूर्य मुख्य मंदिर पर विराजमान शिवलिंग के चरण स्पर्श न कर ले। मुगल काल में बहुत शासकों ने इसे रोकने का बहुत प्रयत्न किया पर वे असफल रहे।

अन्य जानकारी

बाथू कि लड़ी के पास ही महाराणा प्रताप सागर में रैनसर नामक एक टापू हैं। पौंग बांध पक्षी अभ्यारण्य में हर साल 100 से अधिक प्रजातियों के 1 लाख से अधिक पक्षी सर्दियों में प्रवास के लिए आते हैं।

बाथू की लड़ी गर्मियों में घूमने के लिए उपयुक्त जगह हैं। बाथू की लड़ी पहुंचने के दो मार्ग हैं। नगरोटा सुरियाँ से जल मार्ग के द्वारा तथा ज्वाली से सड़क मार्ग द्वारा यहाँ पहुंचा जा सकता हैं।

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